दो दिवसीय वार्ता के लिए अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल पहुंचा भारत
India-US Trade Deal (द भारत ख़बर), नई दिल्ली : जी7 समिट के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने द्विपक्षीय बैठक की थी। इस दौरान दोनों नेताओं ने अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि भारत-अमेरिकी व्यापार समझौते पर जल्द से जल्द निर्णायक वार्ता की जाए। इसके बाद दोनों तरफ से इस दिशा में अहम कदम उठाए गए।
इन्हीं प्रयासों के चलते अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल अपने दो दिवसीय दौरे के चलते भारत पहुंच चुकी है। इस दो दिवसीय वार्ता के दौरान दोनों देशों की यह कोशिश होगी की भारत-अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण को अंतिम रूप देने की दिशा में अहम प्रगति की जाए। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर और केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल नई दिल्ली में 23 से 24 जून तक दो दिन वार्ता करेंगे। इससे पहले दोनों देशों के मुख्य वातार्कारों के बीच 2 से 4 जून तक नई दिल्ली में विस्तृत बातचीत हुई थी।
अगले माह समझौते का पहला चरण लागू करने की कवायद
वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल के अनुसार, मंत्री स्तरीय वार्ता का मुख्य उद्देश्य व्यापार समझौते के ढांचे को अंतिम रूप देना है। सरकार को उम्मीद है कि अगले महीने के मध्य तक समझौते के पहले चरण को लागू किया जा सकता है। यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है, जब अमेरिका ने फरवरी 2026 में लगाए 10% अस्थायी अतिरिक्त आयात शुल्क की अवधि 24 जुलाई को समाप्त होने वाली है। इसके बाद अमेरिका को नई शुल्क व्यवस्था लागू करनी होगी। अमेरिकी न्यायालय के फैसलों और बदले हुए टैरिफ ढांचे के कारण दोनों देशों को समझौते की शर्तों पर फिर से विचार करना पड़ रहा है।
व्यापार समझौते को लेकर ये बोले थे पीयूष गोयल
गोयल ने कहा है कि भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) तब तक लागू नहीं किया जाएगा, जब तक भारत को प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले बेहतर व्यापारिक लाभ नहीं मिल जाता। उन्होंने संकेत दिया कि दोनों देशों के बीच शुल्क (टैरिफ) से जुड़े कुछ मुद्दे अभी बाकी हैं।
भाजपा मुख्यालय में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में गोयल ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच समझौते का ढांचा पहले ही तय किया जा चुका है और इसकी घोषणा भी हो चुकी है। हालांकि कुछ टैरिफ संबंधी मामलों पर सहमति बनना अभी बाकी है। उन्होंने कहा कि भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसके उत्पादों पर लगने वाले शुल्क प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में कम हों। ऐसा होने के बाद ही व्यापार समझौते को लागू किया जाएगा।
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