फरीदाबाद. गंभीर मरीज के लिए इलाज जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उसे समय पर अस्पताल पहुंचाना भी है. दिल्ली-NCR जैसे शहरों में सड़क पर जाम लगने से कई बार एंबुलेंस को लंबा रास्ता तय करना पड़ता है. ऐसे हालात में हेलीकॉप्टर एंबुलेंस गंभीर मरीजों के लिए बड़ा विकल्प बन सकती है. फरीदाबाद में पहली बार एक मरीज को कानपुर से हेलीकॉप्टर के जरिए सीधे अस्पताल की इमरजेंसी तक पहुंचाया गया. लोकल 18 से फरीदाबाद अमृता हॉस्पिटल के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. आशुतोष शर्मा बताते हैं कि आज के समय में ऐसी सुविधा जरूरी है, क्योंकि कई बीमारियों में कुछ मिनट या घंटे की देरी भी मरीज की हालत पर असर डाल सकती है. इसी जरूरत को देखते हुए अस्पताल की इमारत में शुरू से ही हेलीपैड की व्यवस्था रखी गई थी. फरवरी 2026 में इसके लिए DGCA से मंजूरी मिली.
डॉ. आशुतोष शर्मा बताते हैं कि हेलीकॉप्टर का किराया उसके मॉडल और सेवा देने वाली कंपनी के हिसाब से बदलता है. सिंगल इंजन हेलीकॉप्टर के लिए करीब ढाई लाख रुपये प्रति घंटे तक खर्च हो सकता है. डबल इंजन वाले बड़े हेलीकॉप्टर का शुल्क लगभग चार से साढ़े चार लाख रुपये प्रति घंटे तक पहुंच सकता है. करीब 300 किलोमीटर के आसपास की दूरी में यह साधन ज्यादा फायदेमंद हो सकता है. डॉ. आशुतोष के मुताबिक, हेलीपैड तैयार करने के लिए इमारत के ढांचे को अतिरिक्त मजबूती देनी पड़ती है. सामान्य निर्माण की तुलना में करीब 30 से 40 प्रतिशत अतिरिक्त खर्च आ सकता है. मरीज के लिए इसका फायदा यह है कि उतरने के बाद उसे दोबारा सड़क के रास्ते किसी दूसरे वाहन से नहीं ले जाना पड़ता.
जिनके पास इतना पैसा नहीं, उनका क्या
डॉ. आशुतोष शर्मा बताते हैं कि हमारे यहां हेलीपैड से अस्पताल के अंदर जाने के लिए लिफ्ट की सुविधा मौजूद है. मरीज को जरूरत के मुताबिक इमरजेंसी, क्रिटिकल एरिया या ऑपरेशन थिएटर तक पहुंचाया जा सकता है. कानपुर से आए मरीज को इस बार सीधे इमरजेंसी में ले जाया गया. हर आम परिवार के लिए निजी खर्च पर एयर एंबुलेंस लेना आसान नहीं है. कुछ इंश्योरेंस कंपनियों की हेल्थ पॉलिसी में हेलीकॉप्टर से मरीज लाने का प्रावधान रहता है. जिन लोगों की पॉलिसी में यह सुविधा शामिल है, वे शर्तों के अनुसार इसका लाभ उठा सकते हैं. डॉ. आशुतोष बताते हैं कि हेलीकॉप्टर उतारने की अंतिम मंजूरी DGCA से मिलती है. इससे पहले फायर सर्विस, स्ट्रक्चरल इंजीनियर और स्थानीय प्रशासन से जुड़ी औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं. सुरक्षा जांच के बाद ही लैंडिंग की अनुमति मिलती है.
समय सबसे कीमती
डॉ. आशुतोष शर्मा के मुताबिक हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, सड़क हादसे, गंभीर प्रसव और नवजात से जुड़े मामलों में हवाई रास्ता उपयोगी हो सकता है. ऑर्गन ट्रांसप्लांट में भी समय की बड़ी भूमिका रहती है. किसी दूसरे शहर में उपलब्ध लिवर या किडनी को जल्दी पहुंचाने से प्रत्यारोपण की प्रक्रिया समय पर शुरू की जा सकती है. दिल्ली एयरपोर्ट पर लैंड करने के बाद मरीज को अस्पताल तक पहुंचाने में कम से कम दो से ढाई घंटे का समय ट्रांसपोर्ट में लग सकता है. हेलीकॉप्टर से मरीज सीधे अस्पताल की छत पर बने हेलीपैड पर लैंड कर सकता है. इसके बाद मरीज को बिना किसी ट्रैफिक बाधा के सीधे इमरजेंसी और जरूरत पड़ने पर ऑपरेशन थिएटर तक ले जाया जा सकता है. हमारे अस्पताल में पहली बार ऐसा हुआ है, जब कोई मरीज हेलीकॉप्टर के जरिए सीधे अस्पताल पहुंचा है.
डॉ. आशुतोष शर्मा बताते है कि महानगरों में लगातार बढ़ते ट्रैफिक और गंभीर मरीजों के लिए समय की अहमियत को देखते हुए हेलीकॉप्टर आधारित एंबुलेंस सेवा भविष्य में मेडिकल इमरजेंसी के क्षेत्र में गेम चेंजर साबित हो सकती है.