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    जाकि रहि भावना जैसी, प्रभु मूरत देखहिं तिन तैसी

    अंकित कुमारBy अंकित कुमारJanuary 23, 2026No Comments7 Mins Read
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    Editorial Aaj Samaaj: जाकि रहि भावना जैसी, प्रभु मूरत देखहिं तिन तैसी
    Editorial Aaj Samaaj: जाकि रहि भावना जैसी, प्रभु मूरत देखहिं तिन तैसी

    Editorial Aaj Samaaj | राजीव रंजन तिवारी | रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है, जाकि रहि भावना जैसी प्रभु मूरत देखहिं तिन तैसी। एक तरफ प्रयागराज मेला प्रशासन नोटिस देकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने पर सवाल उठा रहा है तो वहीं उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने उन्हें पूज्य शंकराचार्य कह कर संबोधित किया है। जबकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि जो व्यक्ति धर्म के खिलाफ आचरण करता है,

    चाहे वह किसी भी रूप में क्यों न हो, उसे सनातन परंपरा का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। वैसे तो उन्होंने नाम किसी का नहीं लिया। लेकिन जिन पर निशाना साधा, उनको कालनेमि तक कह दिया। कहा गया कि योगी आदित्यनाथ का निशाना स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर ही था। हालांकि कुछ ही घंटे बाद डिप्टी सीएम केशव मौर्य मीडिया के सामने आए और कहा कि पूज्य शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के चरणों में प्रणाम है। केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि वह बढ़िया से स्नान करें। उनसे प्रार्थना है और इस विषय का समापन करें।

    प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान मौनी अमावस्या के स्नान को लेकर ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन आमने-सामने आ गए थे। मेला प्रशासन ने उन्हें पालकी पर सवार होकर स्नान के लिए जाने से रोक दिया था। इसके बाद शंकराचार्य समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की हुई थी। इस घटना से नाराज होकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने धरना शुरू कर दिया था।

    वहीं मेला प्रशासन ने उनको नाम के साथ शंकराचार्य लिखने पर नोटिस थमा दिया। इस घटना के बाद से ही योगी आदित्यनाथ सरकार और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद आमने-सामने हैं। योगी के बयान में इस्तेमाल किया गया कालनेमि शब्द अपने आप में गहरा अर्थ रखता है। कालनेमि का उल्लेख रामायण में मिलता है। वह एक मायावी असुर था, जिसने साधु का वेश धारण कर हनुमान को भ्रमित करने की कोशिश की थी। बाहर से वह धर्मात्मा और तपस्वी दिखाई देता था, लेकिन भीतर से उसका उद्देश्य भगवान राम के कार्य में बाधा डालना था। अंततः हनुमान ने उसके छल को पहचान लिया और उसका वध कर दिया।

    गौरतलब है कि प्रयागराज में माघ मेला के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों और मेला प्रशासन के बीच टकराव हो गया था। इस विवाद ने तूल पकड़ते हुए राजनीतिक रंग ले लिया। आरोप-प्रत्यारोप के बीच मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को एक नोटिस भेजा। इसमें लिखा था कि वह किस आधार पर खुद को शंकराचार्य बताते हैं? मेला प्रशासन की ओर से यह सवाल सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के आधार पर पूछा गया था, जिसमें शंकराचार्य की नियुक्ति और पट्टाभिषेक प्रक्रिया पर रोक की बात थी।

    बता दें कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद साल 2022 से ही ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य के तौर पर जाने जाते हैं। हालांकि इस पद पर उनकी नियुक्ति शुरू से ही विवादित मानी जाती रही है। इस विवाद का प्रेत मौनी अमावस्या के दिन प्रयागराज में हुए टकराव के दो दिन बाद फिर जी उठा। इसी के साथ जब इसका इतिहास खंगालने चलें तो इसका सिरा 20वीं सदी के बीच के दौर यानी 50-60 के दशक में चला जाता है। कहानी शुरू होती है साल 1941 से। पहले एक जरूरी बात जान लेते हैं कि 1941 से पहले लगभग 168 वर्षों तक ज्योतिर्मठ में शंकराचार्य की गद्दी खाली रही थी। इससे पहले 18वीं सदी में ज्योतिर्मठ पर स्वामी रामकृष्ण तीर्थ काबिज रहे। लेकिन उनके लिए भी कई जगहों पर शंकराचार्य की उपाधि दर्ज नहीं है, लेकिन मठ उनके संरक्षण में था।

    स्वामी रामकृष्ण तीर्थ के निर्वाण (मृत्यु) के बाद लगभग 165 वर्षों तक मठ निष्क्रिय रहा। इस दौरान कई साधुओं और गुरुओं ने शंकराचार्य पद पर दावा किया, जिससे 1900 के दशक से ही कई दीवानी मुकदमे दर्ज हुए। कुछ समय तक बद्रीनाथ मंदिर के रावल को भी ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य माना गया। काफी बाद में तीन और पीठों के शंकराचार्यों ने मिलकर स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती को शंकराचार्य पद के लिए राजी किया और उन्हें इस पद के लिए स्वीकृति भी दी।

    इस तरह 11 मई 1941 को स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती की नियुक्ति वाराणसी के भारत धर्म महामंडल (बीडीएम) से जुड़े साधु-संतों की ओर से की गई। इस नियुक्ति को पुरी के शंकराचार्य स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ और शृंगेरी के शंकराचार्य स्वामी चंद्रशेखर भारती का समर्थन था। इसके अलावा गढ़वाल, वाराणसी और दरभंगा के शासकों ने भी उन्हें समर्थन दिया और ब्रह्मानंद सरस्वती सर्वमान्य तरीके से ज्योतिष्पीठ (ज्योतिर्मठ) के शंकराचार्य बने। उनके दौर में ज्योतिर्मठ उत्तर भारत में अद्वैत वेदांत का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा। दिसंबर 1952 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी इस मठ में पहुंचे थे। 20 मई 1953 को स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती ब्रह्मलीन हो गए। यहीं से उस विवाद की भी शुरुआत हुई जो आज तक जारी है।

    वर्ष 1953 में ब्रह्मानंद सरस्वती के ब्रह्मलीन होने के बाद उनके शिष्य स्वामी हरिहरानंद सरस्वती को शंकराचार्य पद का प्रस्ताव दिया गया, लेकिन वह इसके लिए राजी नहीं हुए। इसके बाद दावा किया गया कि शंकराचार्य रहे ब्रह्मानंद सरस्वती ने मृत्यु से पांच माह पहले एक वसीयत तैयार की थी, जिसे इलाहाबाद में रजिस्टर्ड बताया गया। इस कथित वसीयत में चार नाम थे, जिन्हें क्रम से मठ का उत्तराधिकारी बताया गया था।

    पहला नाम था स्वामी शांतानंद सरस्वती का। इसके बाद स्वामी द्वारकेशानंद सरस्वती, स्वामी विष्णुदेवानंद सरस्वती और स्वामी परमानंद सरस्वती के नाम शामिल थे। इसी आधार पर स्वामी शांतानंद सरस्वती ने शंकराचार्य पद ग्रहण किया, लेकिन पुरी, द्वारका और शृंगेरी के शंकराचार्यों के साथ-साथ पूर्व शंकराचार्य ब्रह्मानंद सरस्वती के कई शिष्यों ने उन्हें मान्यता नहीं दी। उनका तर्क था कि आदि शंकराचार्य की ओर से निर्धारित मठाम्नाय महानुशासनम में उत्तराधिकारी की नियुक्ति वसीयत से करने की कोई परंपरा नहीं है। असली मुद्दा यही है कि शंकराचार्य की नियुक्ति वसीयत से नहीं हो सकती है। वसीयत वाली बात पर कई आरोप भी लगे।

    आगे हुआ यूं कि ज्योतिर्मठ से जुड़े संगठनों और वाराणसी के विद्वानों की समिति ने स्वामी कृष्णबोध आश्रमजी महाराज का नाम का प्रस्ताव शंकराचार्य के पद के लिए दिया। स्वामी कृष्णबोध आश्रम का निधन 10 सितंबर 1973 को हुआ। उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के तौर पर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वतीजी महाराज का नाम बढ़ाया। स्वरूपानंद सरस्वती को दीक्षा ब्रह्मानंद सरस्वती ने ही दी थी। चूंकि स्वामी शांतानंद सरस्वती पहले से ब्रह्मानंद सरस्वती की ओर से बनाए गए मठ पर काबिज थे, इसलिए स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने पास ही एक जमीन पर नया आश्रम स्थापित किया।

    यह स्थल आदि शंकराचार्य के शिष्य तोटकाचार्य की प्राचीन गुफा के पास बताया जाता है। इस तरह यह मामला इन 30-35 वर्षों में कोर्ट और पीठ के बीच लगातार चलता रहा और विवाद बना रहा। हालांकि इस पदवी को लेकर यह विवाद 8 अप्रैल 1989 से अधिक गहरा गया, जब ज्योतिषपीठ के वरिष्ठ संत श्रीकृष्ण बोधश्रम के निधन के बाद स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने खुद को उनका उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

    15 अप्रैल 1989 ज्योतिष पीठ के वरिष्ठ संत शांतानंद जी ने वासुदेवानंद सरस्वती को अपना उत्तराधिकारी घोषित, कर दिया। इससे एक ही पीठ के दो शंकराचार्य हो गए। 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वरूपानंद सरस्वती और वासुदेवानंद सरस्वती दोनों को ही शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया था। मामले में सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय का इंतजार किया जाएगा। इस तरह विवाद चलता रहा और 11 सितंबर 2022 को संत स्वरूपानंद सरस्वती का निधन हो गया।

    उसके बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अगले दिन खुद को शंकराचार्य घोषित कर दिया। 16 अक्टूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने अविमुक्तेश्वरानंद पट्टाभिषेक और छत्र चंवर के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। हालांकि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के वकील ने मंगलवार को उनकी तरफ से इस मामले में पक्ष रखा है। सुप्रीम कोर्ट के वकील पीएन मिश्रा ने कहा कि मेला प्रशासन के नोटिस में 14 अक्टूबर 2022 के आदेश का हवाला दिया गया है।

    प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के जिस आदेश का हवाला दे रहा है, उसके पहले 21 सितंबर 2022 का आदेश है, जिसके ऑर्डर में स्वामी अवमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य बताया गया था। वकील पीएन मिश्रा के मुताबिक, 14 अक्टूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने जो ऑर्डर दिया था उसमें सुप्रीम कोर्ट ने 17 अक्टूबर के बाद किसी पट्टाभिषेक पर रोक लगाई थी।

    स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक इससे पहले ही हो चुका था। बहरहाल, योगी आदित्यनाथ द्वारा सनातन धर्म में कालनेमि शब्द के प्रयोग के बाद विवाद और बढ़ने के आसार हैं। अब देखना यह है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से क्या टिप्पणी आती है। (लेखक द भारत ख़बर के संपादक हैं।)

    राजीव रंजन तिवारी, संपादक, द भारत ख़बर।

     

    यह भी पढ़ें : Editorial Aaj Samaaj: संवेदना और संवाद का पैमाना

     

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