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    Home»Breaking News»नेहरू के हस्तक्षेप से श्रीकृष्ण सिंह बने थे बिहार के पहले मुख्यमंत्री
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    नेहरू के हस्तक्षेप से श्रीकृष्ण सिंह बने थे बिहार के पहले मुख्यमंत्री

    अंकित कुमारBy अंकित कुमारNovember 5, 2025No Comments5 Mins Read
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    Editorial Aaj Samaaj: नेहरू के हस्तक्षेप से श्रीकृष्ण सिंह बने थे बिहार के पहले मुख्यमंत्री
    Editorial Aaj Samaaj: नेहरू के हस्तक्षेप से श्रीकृष्ण सिंह बने थे बिहार के पहले मुख्यमंत्री

    Editorial Aaj Samaaj | डॉ. अवधेश कुमार | आज बिहार में पहले चरण का मतदान है। ऐसे में बिहार की राजनीति को समझना बेहद जरूरी है। इसकी शुरुआत स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन से करनी होगी। 1917 में महात्मा गांधी ने बिहार की धरती पर चंपारण सत्याग्रह चलाया, जिसके लिए राजकुमार शुक्ल और रामलाल शाह ने गांधी जी को आमंत्रित किया था। गांधी जी के साथ डॉ. राजेंद्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, आचार्य कृपलानी, डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह समेत कई कांग्रेसी नेता पहुंचे। यह आंदोलन बिहार को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ने वाला पहला प्रयास था।

    डॉ. अवधेश कुमार
    डॉ. अवधेश कुमार

    1920 के दशक में बिहार प्रांतीय कांग्रेस कमेटी (बीपीसीसी) के गठन की कवायद शुरू हुई। तब कांग्रेस कायस्थों के प्रभाव में थी। 1930 के दशक तक बिहार की राजनीति में भूमिहारों और राजपूतों का उदय हो चुका था। भूमिहार जाति के श्रीकृष्ण सिंह ने मुंगेर में वकालत के बाद राजनीति में सक्रियता दिखाई। वे बिहार विद्यापीठ के संस्थापक सदस्य थे और 1935 में बीपीसीसी के अध्यक्ष बने। टी.एन.बी. कॉलेज, भागलपुर में प्रोफेसर अनुग्रह नारायण सिंह राजपूत जाति से थे। गांधीजी के करीबी थे और 1917 में चंपारण सत्याग्रह में शामिल हो चुके थे।

    1937 के प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस ने बहुमत हासिल किया। 20 जुलाई 1937 को श्रीकृष्ण सिन्हा प्रीमियर और अनुग्रह नारायण सिंह डिप्टी प्रीमियर बने। तब दोनों पद आज के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के समकक्ष थे। दो वर्ष बाद 1939 में जब द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ, तब दोनों ने अपने-अपने पदों से इस्तीफा दे दिया। आजादी के बाद 2 अप्रैल 1946 को श्रीकृष्ण सिंह बिहार के पहले मुख्यमंत्री और अनुग्रह नारायण सिंह उपमुख्यमंत्री बने। इस जोड़ी को ‘आधुनिक बिहार का वास्तुकार’ कहा जाता है।

    श्रीकृष्ण सिंह और अनुग्रह नारायण की जोड़ी में 1952 के बिहार चुनाव के बाद दरार पड़ गई, क्योंकि 330 सदस्यों वाली विधानसभा में 239 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत वाली कांग्रेस सरकार में दोनों मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। मुख्यमंत्री का नाम तय करने के लिए पटना के सदाकत आश्रम में विधायक दल की बैठक बुलाई गई, जहां राजपूत समुदाय के नेता अनुग्रह नारायण सिंह को मुख्यमंत्री बनाने की वकालत करने लगे। उनका तर्क था कि अनुग्रह प्रशासनिक रूप से कुशल व्यक्ति हैं। डिप्टी प्रीमियर होते हुए वित्त, स्वास्थ्य व कृषि जैसे महत्वपूर्ण विभागों को संभालने का अनुभव रखते हैं। कायस्थ समाज से आने वाले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का समर्थन भी अनुग्रह के साथ था। राजेंद्र प्रसाद का तर्क था कि अनुग्रह अत्यधिक संतुलित व्यक्ति हैं। उनके मुख्यमंत्री बनने से बिहार को स्थिर सरकार मिलेगी। यह देख श्रीकृष्ण सिंह के पक्ष में भूमिहार नेता भी लामबंद हो गए। उनका तर्क था कि श्रीकृष्ण सिंह की लोकप्रियता बेमिसाल है, तभी तो ‘बिहार केसरी’ कहे जाते हैं। सार्वजनिक सभाओं में ‘सिंहनाद’ के लिए प्रसिद्ध हैं।

    स्वतंत्रता संग्राम में आठ वर्ष जेल काट चुके हैं और बिहार में गांधीजी के सिद्धांतों के प्रतीक हैं। इस बैठक में विवाद चरम पर पहुंच गया, क्योंकि राजपूत मुख्यमंत्री की कुर्सी अनुग्रह का हक बताने लगे, जबकि भूमिहार जोर-जोर से कहने लगे कि श्रीकृष्ण की लोकप्रियता से कांग्रेस मजबूत होगी। इस प्रकार, राजपूत नेता अनुग्रह को सीएम बनाने के लिए दबाव बना रहे थे, जबकि भूमिहार श्रीकृष्ण के पक्ष में थे। यह बिहार की राजनीति में जाति का पहला बड़ा खेल था। यह जंग बिहार की कुर्सी के लिए व्यक्तिगत नहीं, बल्कि जातिगत थी। तब बिहार में भूमिहार की आबादी लगभग 3-4 प्रतिशत और राजपूत की 4-5 प्रतिशत थी। दोनों उच्च जातियां थीं और बिहार की राजनीति में अपना दबदबा बनाना चाहती थीं। कायस्थ और ब्राह्मण भी कांग्रेस में ही थे। दलित, पिछड़ों और मुसलमानों को मात्र वोट बैंक बनाया गया।

    1952 के आम चुनाव के बाद पं. जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। वे श्रीकृष्ण सिंह को बिहार का मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, क्योंकि नेहरू का मानना था कि श्रीकृष्ण सिंह की लोकप्रियता और स्वतंत्रता संग्राम का योगदान राज्य को मजबूत बनाएगा। इस बैठक में नेहरू ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने अनुग्रह से व्यक्तिगत रूप से बात की और फॉर्मूला सुझाया। साथ ही धमकी दी कि यह विवाद न सुलझा तो केंद्रीय नेतृत्व को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। इसके बाद अनुग्रह नारायण ने बिहार के पहले मुख्यमंत्री के रूप में श्रीकृष्ण सिंह के नाम का प्रस्ताव रखा। वे स्वयं उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री बने।

    इसके बाद, अनुग्रह नारायण सिंह एक दिन श्रीकृष्ण सिंह के घर पहुंचे, जहां पुराने साथी न केवल गले मिले, बल्कि फूट-फूटकर रोए भी। अनुग्रह को पछतावा था कि वे श्रीकृष्ण के खिलाफ क्यों हो गए? इसके बाद दोनों की दुश्मनी दोस्ती में बदल गई। अनुग्रह ने 17 वर्ष तक उपमुख्यमंत्री के रूप में श्रीकृष्ण का साथ दिया। दोनों ने कोसी प्रोजेक्ट, नेतरहाट स्कूल, इंजीनियरिंग कॉलेज (मुजफ्फरपुर, भागलपुर आदि) स्थापित किए। दोनों ने मिलकर बिहार को नया आकार दिया। श्रीकृष्ण सिंह ने कृषि, शिक्षा, उद्योग पर जोर दिया, जिसके चलते पहली पंचवर्षीय योजना में बिहार शीर्ष पर रहा। अनुग्रह ने वित्तीय स्थिरता दी। जवाहरलाल नेहरू ने कई बार अनुग्रह को केंद्रीय वित्त मंत्री बनने का प्रस्ताव दिया, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। यह जोड़ी गांधीवादी मूल्यों की मिसाल थी।

    ऐतिहासिक रूप से बिहार के प्रारंभिक राजनीति में उच्च जातियों का कांग्रेस और सरकार पर दबदबा रहा। 1952-62 तक विधायकों में 40 प्रतिशत उच्च जाति के ही थे। 1961 में श्रीकृष्ण सिंह की मृत्यु के बाद ब्राह्मण समाज के बिनोदानंद झा और कायस्थ समाज के कृष्ण बल्लभ सहाय के बीच मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए संघर्ष चला। जाति ने बिहार को अस्थिर बनाया, जो जेपी आंदोलन और मंडल तक चला। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह इनके निजी विचार हैं।)

    यह भी पढ़ें : Editorial Aaj Samaaj: टैरिफ की उलझन से सौदे की उम्मीद तक

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