
US Fed Policy Update: अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने अपनी मौद्रिक नीति बैठक में ब्याज दरों को 3.75% से 4% के दायरे में स्थिर रखने का फैसला किया है। फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) की बुधवार को हुई बैठक में यह निर्णय 10-2 के बहुमत से लिया गया। अमेरिका में महंगाई के ऊंचे स्तर और आर्थिक गतिविधियों में मजबूती के बीच फेड ने फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव नहीं करने का फैसला किया है। इस निर्णय का असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था के साथ-साथ वैश्विक वित्तीय बाजारों, विदेशी निवेश और भारतीय रुपये पर भी पड़ सकता है।
फेडरल रिजर्व ने क्यों स्थिर रखीं ब्याज दरें?
अमेरिकी केंद्रीय बैंक के मुताबिक देश में आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं और घरेलू खर्च में भी लचीलापन दिखाई दे रहा है। इसके बावजूद महंगाई अभी भी फेड के 2% के दीर्घकालिक लक्ष्य से ऊपर है। अमेरिकी ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2026 में अमेरिका की सालाना उपभोक्ता महंगाई दर बढ़कर 3.7% हो गई, जबकि अगस्त में यह 3.4% थी। ऐसे में फेड को महंगाई पर नियंत्रण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। FOMC की बैठक में 10 सदस्यों ने ब्याज दरों को मौजूदा स्तर पर बनाए रखने का समर्थन किया, जबकि दो सदस्यों ने दरों में 0.25 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी के पक्ष में मतदान किया। फिलहाल फेड ने भविष्य में ब्याज दरों में बदलाव की कोई निश्चित समयसीमा नहीं दी है।
भारतीय शेयर बाजार पर क्या होगा असर?
अमेरिका में ब्याज दरें ऊंचे स्तर पर बनी रहने से भारतीय शेयर बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की दिलचस्पी प्रभावित हो सकती है। जब अमेरिकी बॉन्ड से अपेक्षाकृत आकर्षक रिटर्न मिलता है, तो कुछ वैश्विक निवेशक उभरते बाजारों में निवेश घटाकर अमेरिकी संपत्तियों को प्राथमिकता दे सकते हैं। इससे भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ने की आशंका रहती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि विदेशी निवेश अनिवार्य रूप से घटेगा। निवेशकों के फैसले कंपनियों के नतीजों, भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर, बाजार के मूल्यांकन और वैश्विक जोखिमों पर भी निर्भर करते हैं। फेड के फैसले के बाद भारतीय शेयर बाजार में कारोबार की शुरुआत सीमित उतार-चढ़ाव के साथ होने की उम्मीद है।
भारतीय रुपये पर बढ़ सकता है दबाव
अमेरिकी ब्याज दरों का असर डॉलर की मांग और अंतरराष्ट्रीय पूंजी प्रवाह पर पड़ सकता है। अगर डॉलर मजबूत होता है और विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालते हैं, तो रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। इसके विपरीत, डॉलर कमजोर होने या भारत में विदेशी निवेश बढ़ने से रुपये को सहारा मिल सकता है। रुपये की चाल केवल फेड के फैसले से तय नहीं होती। भारत का व्यापार घाटा, विदेशी मुद्रा भंडार, कच्चे तेल की कीमतें और भारतीय रिजर्व बैंक के कदम भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए मौजूदा फैसले के बाद रुपये में किसी बड़ी गिरावट या मजबूती का अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।
कच्चे तेल और महंगाई पर क्या असर पड़ेगा?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने या डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर पड़ने से आयात बिल बढ़ सकता है। इसका असर परिवहन, उत्पादन और अन्य वस्तुओं की लागत पर पड़ सकता है, जिससे घरेलू महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। बुधवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 115 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थी। अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत के चालू खाते और महंगाई के परिदृश्य पर इसका असर पड़ सकता है।
RBI की मौद्रिक नीति पर क्या होगा असर?
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले का भारतीय रिजर्व बैंक की नीति पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि RBI अपनी ब्याज दरों का फैसला केवल अमेरिकी केंद्रीय बैंक के आधार पर नहीं करता। वह घरेलू महंगाई, आर्थिक विकास, रुपये की स्थिति, कर्ज की मांग और वित्तीय स्थिरता जैसे कारकों को ध्यान में रखता है। अगर अमेरिकी ब्याज दरें ऊंची बनी रहती हैं और डॉलर मजबूत होता है, तो RBI के लिए घरेलू परिस्थितियों के अनुरूप ब्याज दरों में कटौती करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। दूसरी ओर अगर घरेलू महंगाई नियंत्रित रहती है और आर्थिक परिस्थितियां अनुकूल होती हैं, तो RBI अपने स्वतंत्र आकलन के आधार पर फैसला ले सकता है। इसलिए फेड के फैसले से भारत में ब्याज दरों में तत्काल बदलाव होना जरूरी नहीं है।
