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    Home»Breaking News»कार्बी आंगलोंग के लोगों का डर
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    कार्बी आंगलोंग के लोगों का डर

    अंकित कुमारBy अंकित कुमारDecember 26, 2025No Comments7 Mins Read
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    Editorial Aaj Samaaj
    Editorial Aaj Samaaj: कार्बी आंगलोंग के लोगों का डर

    Editorial Aaj Samaaj | राजीव रंजन तिवारी | तमाम आधुनिकता के बावजूद लोगों में अब भी जड़ से जुड़े रहने की ललक दिखाई दे रही है। असम के कार्बी आंगलोंग के लोगों को इसी बात का डर सता रहा है कि कहीं उन्हें बाहरी लोग बेदखल न कर दें। बेदखल संस्कृति, सभ्यता और परंपरा से। आरोप है कि गैर-आदिवासी लोगों के दशकों से कथित कब्जे के कारण वे अपने जमीन पर जनसांख्यिकी, राजनीतिक और आर्थिक नियंत्रण खो रहे हैं। हाल ही में हुई हिंसा का तात्कालिक कारण विलेज ग्रेजिंग रिजर्व (वीजीआर) और प्रोफेशनल ग्रेजिंग रिजर्व (पीजीआर) की जमीन से कथित कब्जा करने वालों को हटाने की लंबे समय से चली आ रही मांग थी। ये इलाके असल में जानवरों के चरने के लिए तय थे और आदिवासियों की रोजी-रोटी के लिए कानूनी तौर पर सुरक्षित थे। कहा जा रहा है कि 7184 एकड़ से ज्यादा जमीन पर गैर-आदिवासी (बिहार-यूपी के लोग) ने गैर-कानूनी तरीके से कब्जा कर लिया है, जो छठी अनुसूची वाले इलाकों में लागू आदिवासी जमीन सुरक्षा कानूनों का उल्लंघन है।

    राजीव रंजन तिवारी, संपादक, द भारत ख़बर

    कार्बी आंगलोंग और पश्चिम कार्बी आंगलोंग के मूल निवासी अपने जमीन के अधिकारों की सुरक्षा की मांग को लेकर हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं। सबसे ज्यादा अशांति पश्चिम कार्बी आंगलोंग में है। सुरक्षित आदिवासी जमीन पर कथित कब्जे के खिलाफ शुरू हुआ शांतिपूर्ण आंदोलन हिंसक रूप ले लिया। इसमें दो लोगों की मौत हो गई। एक पुलिस की गोली लगने से और दूसरा जिंदा जल गया। हिंसक प्रदर्शनकारियों ने कार्बी आंगलोंग स्वायत्त परिषद (केएएसी) के मुख्य कार्यकारी सदस्य (सीईएम) तुलीराम रोंगहांग के घर में आग लगा दी और खेरोनी में एक बड़े मार्केट कॉम्प्लेक्स में आगजनी की गई। बिगड़ती कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए, असम सरकार ने कार्बी आंगलोंग पहाड़ी इलाके में निषेधाज्ञा लगा दी और इंटरनेट सर्विस को अनिश्चित समय के लिए रोक दिया। बताते हैं कि कार्बी आंगलोंग छठी अनुसूची के तहत स्वायत्त पहाड़ी जिला है, जिसे स्थानीय जनजातियों की जमीन, संस्कृति और पहचान की सुरक्षा के लिए बनाया गया था। कार्बी आंगलोंग स्वायत्त परिषद को औपचारिक रूप से 1952 में बनाया गया था, जिससे यह असम की पहली पूरी तरह से ऑटोनॉमस काउंसिल बन गई।

    1951 के बाद कार्बी आंगलोंग में बसे लोगों को जमीन के मालिकाना हक नहीं मिलते। हालांकि, पहाड़ों में प्रवास दशकों तक जारी रहा, जिसकी शुरुआत एंग्लो-कुकी युद्ध (1917–1919) के बाद बेघर हुए कुकी लोगों के बसने से हुई और 1960 के दशक से बिहार और यूपी से खेती करने वाले लोगों के आने के साथ यह और तेज हो गया। केएएसी के डेटा के मुताबिक, पूरा संघर्ष प्रभावित खेरोनी इलाका पीजीआर जमीन के अंदर आता है। 1,000 से ज्यादा घर, 30 स्कूल, 27 मंदिर, एक मस्जिद, एक पुलिस स्टेशन, बिजली और सिंचाई के ऑफिस चारागाह की जमीन पर बने हैं। अकेले डोकमोका और फुलोनी इलाकों में 2,000 से ज्यादा गैर-कार्बी परिवार कथित तौर पर वीजीआर और पीजीआर जमीन पर रह रहे हैं। फरवरी 2024 में कार्बी युवा संगठनों के लगातार दबाव के बाद केएएसी ने कथित अतिक्रमण करने वालों को बेदखली के नोटिस जारी किए। हालांकि, गुवाहाटी हाई कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) की वजह से बेदखली की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लग गई, जिससे प्रक्रिया रुक गई और आदिवासी समूहों में गुस्सा बढ़ गया।

    स्थानीय लोगों का कहना है कि तनाव तब बढ़ गया जब आठ दिसंबर को पश्चिम कार्बी आंगलोंग के फेलांगपी इलाके में नौ कार्बी कार्यकर्ताओं ने कब्जा करने वालों को तुरंत हटाने की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी। पुलिस ने मुख्य प्रदर्शनकारी नेता लिट्सन रोंगफर और कई अन्य लोगों को प्रदर्शन की जगह से हिरासत में ले लिया। गिरफ्तारी की खबर तेजी से फैली, जिससे बड़ी भीड़ ने खेरोनी पुलिस स्टेशन को घेर लिया और प्रदर्शन करने वालों की रिहाई की मांग करते हुए सड़क जाम कर दीं। स्थिति जल्द ही काबू से बाहर हो गए, जिससे आगजनी और हिंसक झड़पें हुईं। विरोध करने वाले नेताओं का कहना है कि यह आंदोलन सिर्फ चरागाह वाली आरक्षित जमीन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह जिंदा रहने की एक बड़ी लड़ाई है। भूमि अधिकार आंदोलन का नेतृत्व करने वाले रोंगफर ने कहा कि यह सिर्फ पीजीआर या वीजीआर का मुद्दा नहीं है। कार्बी आंगलोंग से कार्बी गायब हो रहे हैं। जो कभी कार्बी जमीन थी, वह अब गैर-कार्बी और गैर-असमिया लोगों की जमीन बन गई है।

    कहा जा रहा है कि कार्बी लोगों ने अपने ही देश में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक ताकत खो दी है। पिछले तीन-चार सालों से हम बेदखली की अपील कर रहे हैं। सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। आज, कार्बी आंगलोंग में कार्बी लोगों की आबादी सिर्फ 35 प्रतिशत है। हम अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए अनुच्छेद 244 के तहत सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि 1980 और 1990 के दशक में कार्बी आबादी 70-80 प्रतिशत थी, लेकिन उनकी संख्या लगातार कम होती गई है। केएएसी की 26 सीटों में से अभी सिर्फ 10 पर कार्बी प्रतिनिधियों का कब्जा है, और बाकी सीटों पर कथित तौर पर गैर-आदिवासियों का दबदबा है। असम सरकार ने व्यवस्था बहाल करने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए हैं। असम के पुलिस महानिदेशक हरमीत सिंह ने खुद हिंसा प्रभावित इलाकों का दौरा किया और कहा कि स्थिति काफी हद तक नियंत्रण में है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि इस मुद्दे को लोकतांत्रिक तरीकों से सुलझाया जाना चाहिए। कार्बी लोगों में यह सोच है कि कार्बी आंगलोंग में अब गैर-कार्बी लोगों की संख्या उनसे अधिक है। लेकिन यह दावा कि कार्बी लोगों की संख्या घटकर 35 प्रतिशत रह गई है, उसे सत्यापित करने की जरूरत है। हम इस मुद्दे को हिंसा या जबरदस्ती निकालने से नहीं सुलझा सकते। बातचीत से हल निकाला जाएगा।

    असम सरकार, कार्बी आंगलोंग ऑटोनोमस काउंसिल और विरोध कर रहे समूहों के प्रतिनिधियों के बीच जल्द ही एक तीन-तरफा मीटिंग होने की उम्मीद है। हालांकि पहाड़ियों में धीरे-धीरे शांति लौट सकती है, लेकिन अंदरूनी झगड़ा स्थानीय जनजातियों के लिए कानूनी जमीन की सुरक्षा और गैर-आदिवासी समुदायों द्वारा दशकों पुरानी बस्तियों के बीच अभी भी अनसुलझा है। जब तक कानूनी और राजनीतिक रूप से स्वीकार्य समाधान नहीं मिल जाता, कार्बी आंगलोंग का लंबे समय से चल रहा जमीन का झगड़ा इस इलाके की नाजुक शांति को प्रभावित करता रहेगा। खैर, अवैध रूप से रहने वाले बिहार और यूपी के लोगों को आदिवासियों की जमीन से खदेड़ने के मुद्दे पर हुई हिंसा व आगजनी के बाद असम का कार्बी आंगलोंग इलाका सुर्खियों में है। राज्य के उत्तर कछार इलाके में स्थित कार्बी आंगलोंग जिला लंबे समय तक उग्रवाद के लिए सुर्खियों में रहा है। इलाके में सक्रिय विभिन्न उग्रवादी संगठन लंबे समय तक अलग राज्य की मांग उठाते रहे हैंष वर्ष 2021 में केंद्र और राज्य सरकार ने यहां सक्रिय पांच उग्रवादी गुटों के साथ एक तितरफा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। उसके बाद एक हजार से ज्यादा उग्रवादियों ने हथियार डाले। समझौते के तहत केंद्र ने इलाके के विकास के लिए एक हजार करोड़ का विशेष पैकेज देने के साथ ही कार्बी आंगलोंग स्वायत्त परिषद को और ज्यादा वित्तीय व प्रशासनिक अधिकार सौंपे थे।

    इससे पहले वर्ष 2016 में इस जिले को दो हिस्सों में बांटकर वेस्ट कार्बी आंगलोंग नामक एक अलग जिले का गठन किया गया था। असम सरकार ने इसी साल स्वायत्त परिषद से बाहर के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए कार्बी कल्याण स्वायत्त परिषद के गठन को हरी झंडी दिखाई है। इलाके में बाहरी लोगों के कथित अतिक्रमण और जमीन संबंधी विवाद लंबे समय से प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है। कार्बी समुदाय के लोगों का आरोप है कि बाहरी लोग इलाके की जमीन पर लगातार कब्जा कर रहे हैं। खासकर बिहार और यूपी से रोजगार के सिलसिले में जिले में आने वालों ने जानवरों की चारागाह वाली जमीन पर कब्जा कर लिया है। बार-बार कहने के बावजूद प्रशासन ने अतिक्रमण हटाने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि अदालत ने इलाके में बाहरी लोगों को उजाड़ने पर रोक लगाई है। हम अदालत के फैसले का सम्मान करते हैं।

    बहरहाल, कार्बी आंगलोंग में स्थानीय लोगों और बाहर से जाकर वहां बसने वाले लोगों के बीच जमीन पर विवाद काफी पुराना है। इस मुद्दे पर अक्सर तनाव पैदा होता रहा है। अब इसी तनाव ने हिंसक रूप ले लिया। फिलहाल तो इलाका शांत है, लेकिन इस मुद्दे के नहीं सुलझने तक यह आग आगे भी रह-रह कर भड़कती रहेगी। देखते हैं क्या होता है? (लेखक द भारत ख़बर के संपादक हैं।)

    यह भी पढ़ें : Editorial Aaj Samaaj: बाबरी मस्जिद विध्वंस के 33 वर्ष बाद

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