Oil Bill Surge : मध्यपूर्व में जारी घमासान से भारतीय खजाने को तगड़ा झटका लगा है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में देश का कच्चे तेल के आयात पर खर्च पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 61% बढ़कर 49.8 अरब डॉलर रहा। हालांकि, पेट्रोल के वॉल्यूम में गिरावट दर्ज की गई है। पेट्रोलियम प्लानिंग ऐंड एनालिसिस सेल (PPAC) ने यह जानकारी दी है।
कीमतें बढ़ने से बिल में बढ़ोतरी
अमेरिका ईरान के बीच जारी घमासान युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने की वजह से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं, जिसकी वजह से तेल आयात बिल में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। भारत ने जून तिमाही में 5.98 करोड़ टन तेल आयात किया, जो पिछले साल की इसी अवधि में 6.26 करोड़ टन था।
जून में तेल का आयात घटा
PPAC के आंकड़ों के मुताबिक, जून में कच्चे तेल का आयात 7% घटकर 1.89 करोड़ टन रहा, जो पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 2.03 करोड़ टन था। वहीं, इंपोर्ट बिल 48% बढ़कर 14.7 अरब डॉलर रहा। भारत कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक देश है। यह अपनी जरूरत का लगभग 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है।
अप्रैल में उथल-पुथल
अप्रैल महीने में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में काफी उतार-चढ़ाव देखा गया। अमेरिका-ईरान द्वारा अस्थायी युद्ध विराम की घोषणा के बाद 17 अप्रैल को कच्चे तेल की कीमत घटकर 90 डॉलर की कीमत पर पहुंच गई थी। हालांकि, संघर्ष के फिर से शुरू होने की आशंका के बीच कीमत 30 अप्रैल को बढ़कर 126.41 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। इस पूरे महीने में तेल की औसत कीमत 117 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रही।
कीमतें फिर बढ़ने की आशंका
मई के पहले सप्ताह में कच्चे तेल की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा रही, जबकि महीने के अंत में दोनों देशों के बीच शांति की उम्मीदों के बीच गिरकर 92.05 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। विशेषज्ञों के मुताबिक, होर्मुज स्ट्रेट से तेल टैंकर वाले जहाजों की आवाजाही पर खतरा मंडरा रहा है, जिससे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं।

