नई दिल्ली. क्रिकेट के मैदान पर आज मुकाबले महज 3 से 4 घंटे में खत्म हो जाते हैं. कभी ऐसा भी मैच होता था जिसकी कोई समय निर्धारित नहीं होती थी.इसे टाइमलेस टेस्ट कहा जाता था. ऐसे ही एक मैच जो इतिहास के पन्नो में दर्ज है. मुकाबला 12 दिन तक चला था और इसमें 1981 रन बनाए गए थे. कमाल की बात यह कि मैच को ड्रॉ इस वजह से करना पड़ा क्योंकि मेहमान टीम को ले जाने वाले जहाज का समय होने वाला था.
आज टी20 क्रिकेट में दर्शक कुछ घंटों में मैच का नतीजा देखना चाहते हैं, वहीं टेस्ट क्रिकेट की पांच दिन भी कई बार लंबा लगता है. क्रिकेट इतिहास में एक दौर ऐसा भी था जब टेस्ट मैचों के लिए समय की कोई सीमा तय नहीं होती थी. इन्हें ‘टाइमलेस टेस्ट’ कहा जाता था जिसमें मुकाबला तब तक चलता था जब तक कोई टीम जीत हासिल नहीं कर लेती. ऐसा ही एक ऐतिहासिक मुकाबला साल 1939 में साउथ अफ्रीका और इंग्लैंड के बीच डरबन के किंग्समीड में खेला गया था. क्रिकेट के इतिहास में खेला गया यह आखिरी टाइमलेस टेस्ट बन गया. इंग्लैंड और साउथ अफ्रीका के बीच यह मैच लगातार 12 दिनों तक चलता रहा था. इस दौरान 43 घंटे से ज्यादा खिलाड़ियों ने मैदान पर समय बिताया. टीमों ने मिलकर कुल 1981 रन बनाए थे.
3 मार्च 1939 को शुरू हुआ ये मुकाबला 14 तारीख तक चला था. साउथ अफ्रीका ने पहली पारी में 530 रन बनाए और जवाब में इंग्लैंड की पूरी टीम 316 रन पर सिमट गई. मेजबान टीम ने अपनी दूसरी पारी में 481 रन का स्कोर बना डाला. मुकाबला जीतने के लिए इंग्लैंड के सामने 696 रन का विशाल लक्ष्य रखा गया था. इंग्लैंड के लिए इस हासिल कर पानी नामुमकिन जैसा माना जा रहा था. इंग्लिश टीम के बैटर ने ऐसा खेल दिखाया जिसने मुकाबला रोमांचक बना दिया. बिल एडरिच ने 219 रन की यादगार पारी खेली वहीं कप्तान वॉली हैमंड ने भी शानदार शतकीय पारी खेलते हुए 140 रन बना डाले. मैच के 12वें दिन इंग्लैंड ने 5 विकेट खोकर 654 रन बना लिए थे. जीत से टीम महज 42 रन दूर थी और पांच विकेट अभी सुरक्षित थे.
सबको ऐसा लग रहा था कि इंग्लैंड की टीम इतिहास रचते हुए टेस्ट में सबसे बड़ी टेस्ट जीत दर्ज कर लेगा. ऐसे समय पर बारिश ने सारा खेल बिगाड़ और इसे रोकना पड़ा. मुकाबला दोबारा शुरु किया जा सकता था लेकिन इससे पहले सामने एक दूसरी समस्या आ गई. इंग्लैंड की टीम को केपटाउन से वापस अपने घर लौटना था और इसके लिए समुद्री जहाज पकड़ना था. अगर टीम के खिलाड़ी वक्त पर मैच खत्म करके ट्रेन से डरबन से नहीं निकलते तो उनकी जहाज छूट जाती. 1939 में यात्रा के ज्यादा साधन मौजूद नहीं थे और लंबी दूरी की यात्रा बेहद मुश्किल थी. ऐसे में दोनों कप्तानों और अंपायरों की सहमति से मैच ड्रॉ करना पड़ा

