Real estate prices increase: देश में मकानों की कीमतें आसमान छू रही हैं। अगर कोविड के समय और कोविड के बाद कीमतों की तुलना करें, तो यह गैप बहुत बड़ा है। प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी फर्म एनारॉक की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीते चार सालों में घरों की कीमतों में 59% की बढ़ोतरी हुई है, जो घरों की निर्माण लागत में 34% की बढ़ोतरी से बहुत ज्यादा है। प्रॉपर्टी की कीमतें बढ़ने का सबसे ज्यादा असर मिडिल क्लास पर पड़ा है। अब मिडिल क्लास का अपने घर का सपना शायद ही साकार हो पाए, क्योंकि अब दो बीएचके की कीमत भी एक करोड़ पार कर चुकी है।
आसामान पर जमीन की कीमतें
एनरॉक के मुताबिक, 2021 और 2025 के बीच भारत के सात प्रमुख शहरों में घरों की कीमतों में 59% की बढ़ोतरी हुई। यह बढ़ोतरी घरों के निर्माण की लागत में हुई 34% की वृद्धि से कहीं ज्यादा थी। जमीन की बढ़ती कीमतों, लोकेशन प्रीमियम और बाजार की स्थितियों ने घर बनाने की लागत और उनकी बिक्री की कीमतों के बीच के अंतर को बढ़ा दिया।
खरीदारों के लिए संकट
एनारॉक ने बताया कि 25 प्रतिशत-अंक का यह अंतर खरीदारों के लिए घर खरीदने की क्षमता का गंभीर संकट और डेवलपर्स के लिए मुनाफे पर बड़ा खतरा दिखाता है। 2021 और 2025 के बीच, स्टैंडर्ड-प्लस रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट बनाने की औसत लागत 6.9 प्रतिशत की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ी, जो 2,681 रुपये प्रति वर्ग फुट से बढ़कर 3,604 रुपये प्रति वर्ग फुट हो गई।
क्या हैं कीमतें बढ़ने की वजहें?
इसी दौरान, रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी की औसत कीमत 12 प्रतिशत की CAGR से बढ़ी, जो 5,826 रुपये प्रति वर्ग फुट से बढ़कर 9,260 रुपये प्रति वर्ग फुट हो गई। एनारॉक ने कहा कि कीमतों में हुई इस बढ़ोतरी का 66 प्रतिशत हिस्सा कंस्ट्रक्शन की लागत से जुड़ा था, जबकि बाकी 34 प्रतिशत बाहरी दबावों के कारण था। इन बाहरी दबावों में जमीन की बढ़ती लागत, डेवलपर्स का मुनाफा और मांग-आपूर्ति की बदलती स्थिति शामिल थी।
कीमतें बढ़ने के मूल कारण
जमीन महंगी हुई
एनारॉक ग्रुप के वाइस-चेयरमैन संतोष कुमार ने कहा, ”पिछले पांच सालों में बड़े शहरों में जमीन की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण कीमतों में बढ़ोतरी, मांग-आपूर्ति का संतुलन, लोकेशन का प्रीमियम और डेवलपर्स की तय कीमतों की वजह से मकान महंगे हुए हैं।”
एनारॉक के अनुसार, कुछ अपवादों को छोड़कर, 2021 और 2026 की पहली छमाही के बीच शीर्ष सात शहरों में जमीन की कीमतों में 50 प्रतिशत से 120 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई। 2021 और 2026 की पहली छमाही के बीच, नेशनल कैपिटल रीजन (NCR) और बेंगलुरु में जमीन की कीमतों में सबसे ज्यादा क्रमश: 70-130 प्रतिशत और 60-120 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई।
पश्चिम एशिया में तनाव
- रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम एशिया में तनाव की वजह से स्टील, ईंधन से जुड़े लॉजिस्टिक्स, बाहर से मंगाए गए फिनिशिंग मटीरियल और मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल और प्लंबिंग (MEP) की लागत में तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जिससे कुल निर्माण लागत में अनुमानित 8-10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
- पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण निर्माण लागत में 8-10 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इसमें स्टील की कीमतों में 20 प्रतिशत की वृद्धि और ईंधन से जुड़ी लॉजिस्टिक्स लागत में सबसे ज्यादा तेजी देखी गई है। MEP और फिनिशिंग मटीरियल की लागत में क्रमशः 9-13 प्रतिशत और 8-12 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
- मजदूरी की लागत में अपेक्षाकृत कम, यानी 5-6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह प्रोजेक्ट की कुल लागत का सबसे बड़ा हिस्सा (लगभग 25-30 प्रतिशत) है। संघर्ष के बीच सीमेंट की कीमतों में 4-5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
डेवलपर्स के लिए, निर्माण लागत में 8-10 प्रतिशत की वृद्धि प्रोजेक्ट के मुनाफे पर काफी असर डालती है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि प्रोजेक्ट किस चरण में है।
मिडिल क्लास पर पड़ेगी मार
मकानों की बढ़ती कीमतों असर अफोर्डेबल (किफायती) और मिड-इनकम हाउसिंग (मध्यम आय वर्ग के घरों) पर ज्यादा पड़ने की संभावना है, क्योंकि यहां खरीदार कीमतों को लेकर ज्यादा संवेदनशील होते हैं। वहीं, प्रीमियम और लग्जरी प्रोजेक्ट्स में कीमतें तय करने की ज्यादा ताकत होती है, जिससे डेवलपर्स या तो बढ़ी हुई लागत का बोझ खुद उठा सकते हैं या उसका कुछ हिस्सा खरीदारों पर डाल सकते हैं।
उन्होंने कहा, ”अब डेवलपर्स के सामने चुनौती यह है कि वे घरों की खरीद की क्षमता और बिक्री की रफ्तार पर असर डाले बिना इस बढ़ी हुई लागत का बोझ घर खरीदारों पर कैसे डालें।

