फरीदाबाद: जेवर एयरपोर्ट के लिए बन रहे एक्सप्रेसवे को लेकर फरीदाबाद के सोतई गांव में किसानों का धरना लगातार जारी है. जमीन अधिग्रहण के मुआवजे की मांग को लेकर किसान पिछले 6 से 7 दिनों से धरने पर बैठे हैं. धरने में महिलाएं, पुरुष और बुजुर्ग भी शामिल हैं. तपती दोपहरी में भी किसान अपनी मांगों को लेकर धरना दे रहे हैं. किसानों का कहना है कि यह जमीन उनके पूर्वजों की है और पीढ़ी दर पीढ़ी यहां खेती होती आई है. खेती ही परिवार के पालन पोषण और रोजगार का मुख्य जरिया रही है.
मंगलवार को धरना स्थल पर किसानों की महापंचायत भी हुई, जिसमें आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में किसान, सरपंच, नंबरदार और गणमान्य लोग पहुंचे. मौके पर हरियाणा पुलिस की टीम टेंट लगाकर मौजूद है और SDM भी मौके पर मौजूद हैं. किसानों ने कहा कि न्याय मिलने तक संघर्ष जारी रहेगा.
किसान क्यों दे रहे धरना?
Local18 से बातचीत में जम्मन चौधरी बताते हैं कि मैं सोतई गांव के स्थाई निवासी हूं और पीढ़ी दर पीढ़ी इसी गांव से संबंध रखता हूं. पिछले 6 से 7 दिनों से किसान धरने पर बैठे हैं. जमीन अधिग्रहित की गई है और किसान अपने मुआवजे की मांग कर रहे हैं. 2022 में NHAI ने मुआवजे की राशि फरीदाबाद के नोडल अधिकारी को ट्रांसफर कर दी थी. 2022 में मुआवजा देना शुरू हुआ और सिर्फ मिल्कियत वाली जमीन का पैसा दिया गया, लेकिन सामलात थोक जाटान हस्म्म में दर्ज उस जमीन का पैसा नहीं दिया गया, जिस पर किसानों के अनुसार उनका कब्जा और मिल्कियत दोनों हैं.
दो साल तक DRO ने अपने पास क्यों रखी राशि?
जम्मन चौधरी बताते हैं यह जमीन 1908-1909 के बंदोबस्त के रिकॉर्ड में दर्ज है. DRO ने 2022 से 2024 तक मुआवजे की राशि अपने पास रखी. इस जमीन पर किसानों का हक बनता है. इसके बाद जमीन का पैसा कोर्ट में जमा कर दिया गया, लेकिन किसानों को इसकी जानकारी नहीं दी गई. करीब 6 महीने बाद किसानों को पता चला कि उनका पैसा कोर्ट में जमा है. किसानों का सवाल है कि 2022 में पैसा आने के बाद दो साल तक DRO ने राशि अपने पास क्यों रखी.
जम्मन चौधरी बताते हैं कि मेरे पास 1954 की चकबंदी का रिकॉर्ड है. 1954 में चकबंदी के दौरान यह रिकॉर्ड कलेक्टर के पास था और उस समय गिरदावारी भी हुई थी. थोक सामलात की एक खतौनी में 16 खाते हैं और इन खातों में अलग-अलग जमीन, किला नंबर, मुस्ततीन और किसानों के नाम दर्ज हैं. 1955-56 की जमाबंदी में किसान का नाम दर्ज नहीं था, लेकिन बाद में रिकॉर्ड कलेक्टर से वापस आने के बाद 1962-63 की जमाबंदी में किसानों के नाम दर्ज किए गए.
DRO के पास कोई दस्तावेज नहीं
जम्मन चौधरी बताते हैं कि 1962-63 की जमाबंदी में किसानों के नाम दर्ज हैं और 1908-1909 के बंदोबस्त के अनुसार किसान जमीन पर अपने हक और मिल्कियत का दावा करते हैं. जब रिकॉर्ड में हमारा कब्जा और मिल्कियत है तो जमीन MCF को कैसे दे दी गई. जब कोर्ट में MCF से जमीन के हक से संबंधित दस्तावेज मांगे गए तो MCF की ओर से कहा गया कि उसके पास कोई दस्तावेज नहीं है और उसे DRO की ओर से पत्र मिला है. किसानों का कहना है कि DRO भी जमीन के हक से संबंधित कोई दस्तावेज पेश नहीं कर पाया है.
कोर्ट तय करेगा मुआवजे की राशि
मयंक भारद्वाज बताते हैं कि यह नेशनल प्रोजेक्ट है और जेवर एयरपोर्ट के लिए एक्सप्रेसवे का निर्माण किया जा रहा है. जमीन की मिल्कियत को लेकर जो विवाद कोर्ट में लंबित हैं, उनमें मुआवजे की राशि पहले ही कोर्ट में जमा करवा दी गई है. विवाद का समाधान होने के बाद कोर्ट के फैसले के आधार पर जिस पक्ष की मिल्कियत तय होगी, मुआवजे की राशि उसी पक्ष को कोर्ट के माध्यम से मिल जाएगी.
नेशनल प्रोजेक्ट का काम रोकना सहीं नहीं
मयंक भारद्वाज बताते हैं कि मुआवजे की राशि कोर्ट में जमा हो चुकी है, इसलिए नेशनल प्रोजेक्ट का काम रोका नहीं जा सकता. निर्माण कार्य जारी रहना चाहिए. काम रोकना अवैध है और बिना अनुमति धरना देकर निर्माण कार्य में बाधा डालने पर कार्रवाई की चेतावनी दी गई है. NHAI की ओर से मुआवजे की राशि पहले ही कोर्ट में जमा करवाई जा चुकी है और कोर्ट के फैसले के बाद संबंधित पक्ष को राशि मिल जाएगी.

