पिछले एक साल में भारत ने बदली व्यापार नीति, नए बाजार तलाशने और व्यापार समझौतों से बढ़ा व्यापार
Business News Update (द भारत ख़बर), बिजनेस डेस्क : पिछले साल अमेरिका द्वारा लागू किए गए नए टैरिफ नियमों के बाद भारत ने अपनी व्यापार नीति में तेजी से बदलाव किया। इसक तहत भारत ने पिछले कई साल से लंबित पड़े व्यापार समझौतों पर जल्दी से वार्ता पूरी की और आयात-निर्यात के लिए नए बाजार तलाश किए। इससे जहां भारत की एक देश पर व्यापार निर्भरता कम हुई वहीं व्यापार में भी तेजी आई है। अब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध के चलते वैसी ही स्थिति एक बार फिर से उत्पन्न हो गई है।
इन विदेशी बाजारों पर भारत का फोकस
ईरान संकट के बीच भारत कारोबार के लिए नए बाजारों में जमने की तैयारी में है। इसके लिए कनाडा, इस्राइल, श्रीलंका, पेरू, चिली, आॅस्ट्रेलिया और मेक्सिको के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर तेजी से काम हो रहा है। फिलीपींस और मालदीव के साथ भी बातचीत आगे बढ़नी है। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तरी अमेरिका (विशेषकर अमेरिका) और यूरोप (नीदरलैंड्स के नेतृत्व में) जैसे पारंपरिक बाजार निर्यात के प्रमुख आधार बने रहे। उत्तर-पूर्व एशिया और पूर्वी अफ्रीका जैसे उभरते क्षेत्र महत्व प्राप्त कर रहे हैं। यह धीरे-धीरे विविधीकरण को दशार्ता है।
इस तरह बढ़ा भारत का कुल व्यापार
मुक्त व्यापार समझौतों के जरिये भारत का कुल व्यापार 2024 में बढ़कर 28.8 फीसदी पहुंच गया, जो 2006 में 4.6 फीसदी था। अमेरिका के साथ व्यापार समझौता लागू हो जाने के बाद यह हिस्सेदारी और बढ़ेगी। भारत के कुल निर्यात-आयात में खाड़ी क्षेत्र की करीब 12 फीसदी है। इसमें यूएई (निर्यात 7.5 फीसदी एवं आयात 6.1 फीसदी) और सऊदी अरब (निर्यात 2.36 फीसदी व आयात 3.9 फीसदी) प्रमुख साझेदार हैं। यूएई एक प्रमुख पुन: निर्यात केंद्र के रूप में कार्य करता है, जो भारत के व्यापार को पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरोप से जोड़ता है।
इन तीन देशों को सबसे ज्यादा निर्यात
भारत के कुल निर्यात में अमेरिका, यूएई और हांगकांग की संयुक्त हिस्सेदारी 70-75 फीसदी है। वहीं, स्पेन भारत के लिए शीर्ष-10 निर्यात गंतव्यों में शामिल हुआ। उत्तर-पूर्व एशिया में निर्यात 33.5 फीसदी बढ़ा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि खाड़ी क्षेत्र में प्रमुख ऊर्जा ढांचों पर मिसाइल हमलों ने आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है, जिससे कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं। वैश्विक स्तर पर परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ रही है।
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