भारतीय क्रिकेट का एक ऐसा सितारा जिसका करियर एक आरोप के चलते डूब गया। जब कोर्ट ने इस आरोप में उन्हें क्लीन चिट दी तो उसका दर्द छलक पड़ा। भारतीय क्रिकेटर और वडोदरा निवासी जैकब मार्टिन को पटियाला हाउस कोर्ट ने एक आपराधिक मामले में शुक्रवार को सभी आरोपों से बरी कर दिया। यह केस 2004 की एक एफआईआर से जुड़ा था, जिसमें IPC की धारा 420, 468, 471 और 120B के साथ पासपोर्ट एक्ट की धारा 12 के तहत उन पर संगीन आरोप थे।
कोई सबूत नहीं मिला
अदालत में पूर्व क्रिकेटर के खिलाफ जाली UK इमिग्रेशन स्टैम्प, ट्रैवल अरेंजमेंट और वित्तीय ट्रांजैक्शन के आरोप साबित नहीं हो सके। कोर्ट ने पाया कि फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन या अजवा स्पोर्ट्स क्लब पर उनके मालिकाना हक या कंट्रोल के बारे में कोई भरोसेमंद सबूत नहीं था। कई गवाह भी आरोपों को साबित करने में नाकाम रहे। इसके बाद कोर्ट ने मार्टिन को बरी कर दिया।
जबरदस्ती नाम जोड़ा गया
मामले में बरी होने के बाद मार्टिन ने कहा, ”यह केस उस समय का है जब उनकी 2004 की टीम का एक सदस्य यूके वीजा की समय-सीमा खत्म होने के बाद भी रुका और नकली इमिग्रेशन स्टैम्प लेकर भारत लौटा।” उन्होंने कहा कि प्राथमिकी में उनका नाम न होने के बावजूद बाद में जांच में उनका नाम जोड़ दिया गया।
रेलवे की नौकरी भी गई
जैकब ने कहा कि इस मामले में बरी होने से उन्हें बड़ी राहत मिली है। पिछले 22 साल में इस केस की वजह से वे बेहद परेशान रहे। उनकी रेलवे की नौकरी भी चली गई। यह समय उनके जीवन का एक टर्निंग पॉइंट है।
नकली स्टैम्पिंग का था मामला
उन्होंने बताया कि साल 2004 में उनकी एक टीम क्रिकेट मैच खेलने यूके गई थी। मैच के बाद टीम के सभी खिलाड़ी वापस लौट आए, लेकिन एक खिलाड़ी वापस नहीं लौटा। उसके पास छह महीने का वीजा था, इसलिए वह वहीं रुक गया। छह महीने से ज्यादा रुकने के बाद नकली स्टैम्पिंग करवा ली। नकली स्टैम्पिंग के बाद जब वह भारत वापस आया, तो उसे यूके डिपोर्ट कर दिया गया। उसे आईजीआई एयरपोर्ट पर ही पकड़ लिया गया और उससे पूछताछ की गई।

